Kaun zimmedaar….

 

तपती है सूखी जमीन

उगलता है आग आसमान

एक बूंद पानी के लिए

तरस्ता है आज इनसान

 

न काले बादलों का ठिकाना

न कहीं छाँव का कोई आशियाना

कुछ सुकून के पलों के लिए

तरस्ता है आज इनसान

 

सभी नदियाँ प्यासी हैं

बादल लुका छुपी खेलते हैं

सावन के ठंडे बौछार के लिए

तरस्ता है आज इनसान

 

मौसम दिखा रहा है रूद्र रूप

कहीं सरदी, बाढ या है तेज धूप

कुदरत की मार से लाचार होकर

तरस्ता है आज इनसान

 

तेरा मेरा की लडाई मे

कुदरत को ढ़केल दिया खाई मे

अपनी ही गलतियों से परेशान होकर

तरस्ता है आज इनसान   ।।

 

 

 

 

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